एक रोटी हमे भी दो

एक रोटी हमे भी दो
कुछ जीने का हक तो हमे भी दो

नहीं मंगाते हम आपकी ऊंची इमारतें
थक जायेंगे जहाँ
अपने आप को ही ढूँढ़ते ढूँढ़ते
छु लेंगे हम भी आसमान को
अपनी ही औकात से

लेकिन

एक रोटी हमें भी दो
कुछ जीने का हक तो
हमे भी दो

आपके बच्चे फलें फूलें
विदेश जाके खूब घूमें
चेहरे पे उनके मुस्कराहट रहे
हमारे बच्चे तो चीखते रहे

एक रोटी हमे भी दो
कुछ जीने का हक तो
हमे भी दो

यह सुनामी जो लायें हैं
हमारे अन्ना
देश को बह ले जायंगे
हमारे अन्ना
यह हवा जो चली है तूफ़ान बनकर
कहीं पेड़ को ही उखाड़ न दे
उसे जकड कर

इससे पहले की हम सब बह जाएँ

एक रोटी हमे भी दो

कुछ जीने का हक तो
हमे भी दो

17 Responses to “एक रोटी हमे भी दो”

  1. Harb says:

    Reminds me of what Guru Gobind Singh’s said in a similar situation (he was not talking of roti but raj/rule really right to live freely)

    “Kou kisi ko raaj na de hain jo le hain nij bal se le hain

    (No one gives you raaj/kingdom on their own, it is won with power.

  2. एक रोटी हमे भी दो
    कुछ जीने का हक तो हमे भी दो

    कया रोटी जानती हे अपनी जात
    अपनी भुख अपनी पयास

    पेट को नही मालुम लोकपाल
    न वो जानता हमारे अन्ना को

    जिनके हो रोज एकादशी
    वो नही जानते कया हे उपवास

    एक रोटी हमें भी दो
    कुछ जीने का हक तो
    हमे भी दो

  3. austere says:

    tsunami wala para yahan baith nahi raha.
    baki badhiya.

  4. Rudra says:

    Shekhar,

    Were you involved with Anna Hazare’s fast? I suppose not. But this poem is very moving…that India after 60 years after the ‘instrument of Transfer ‘ was signed, and an Anglicised Brown-outside-white-inside character was chosen by the British to play along with Partition and let the Looters get away, and then given PM ship, India which has so many dollar millionaires and billionaire politicians, the Loot continues in Broad Daylight.

    Ek roti, the common man will not get , because India is not truly Independent.It’s destiny is resided by Corrupt politicians who are the scum of the society- how else can anyone qualify to lick the boots of a foriegn implant, unless you have no values, no shame, no sense , no sense of history or identity, no pride in the civilization?..,

    Ek roti , will continue to be far away from millions, as India has lost it’s bearings, it’s identity, it’s Dharma.

    whores of allsorts have taken over India-they set the narrative, everything is ‘business’…we now have media whores who set the agenda, create conflict and try to solve the country’s problems in a 45 min talk show, media whores who are also political go-betweens, brokers, we have politicians who are policy whores who sell and set laws for vote banks, we have educated Indians who are intellectual whores as they peddle intellectual subversion , for the sake of appearing secular or liberal ..finally we have young Indians who are service whores, solving the problems of the West rather than India’s.

    The loot of India has not stopped with the British sucking India Bone Dry.,,, it continues , so now we have 2 Trillion dollars worth of Public monies in Swiss banks and elsewhere..where does the problem lie??

    What is the solution?? Rather, what is the Right solution?

    I am tired of crying over poems like these- ‘ek roti’.

    Poignant poems are pointless. We need our blindfolds removed.

  5. DK Matai says:

    Dear Shekhar

    Great to talk. Wonderful poem! Reminds me of Cicero in Rome who said, “Omnia vivunt, omnia inter se conexa” or “Everything is alive; everything is interconnected!” nearly 2,100 years ago.

    All the best, see you at ATCA 24/7 on Yammer!

    DK

    DK Matai
    Executive Chairman, mi2g, London

  6. shekhar says:

    thank you , DK

  7. Geeta says:

    Kya Likhte ho Shekhar bhai
    I like This poem…

    Good job. Thanks for sharing!

  8. Janita says:

    sometimes worlds need a special sound to express a deep thought
    a language from the bottom of your soul,heart to be
    first time it was not english.-)

  9. RajuK says:

    Shekhar,

    This poem is trying to appeal to both the middle-class and the poor, hence it may not fit well in either of these categories.

    When you want to be the voice of the poor, then saying “Ek roti dough(give) ” makes sense, because we acknowledge that bad-luck can strike anyone, so we feel we have the moral obligation to help the person who does not have a roti because he can’t get a job.

    “Jeene ka hak” is what the middle-class asks for. They want fair-play and transparancy. The body of the poem is asking for fairness. Maybe, it would be better to remove references to “Ek Roti”, and just call it “Jeene ka hak”.

    I believe Anna’s struggle is not for charity for the poor (though that is noble too), but for fair-play and transparancy.

    Some people may say, poverty is because of over-population. Now, why does India have a higher population gowth rate than western countries? That is a topic for another poem.

    Regards,

  10. Sia says:

    i remember a thought in sanskrit.
    santo bhai aayi gyaan ki aandhi re by kabirdaas.
    seems like aandhi has come in the form of anna, it will blow away the corruptness from our country,
    n the small people who always gain from the storm,will gain the basic rights of food, cloth n shelter from this. your poem is the only demand of the conman man,, graet evaluation of the problem, in the form of poem.

  11. शेखर जी को बधाई.
    दिल्ली के अनेक पत्रकारों की तुलना में आप फिल्म वाले कहीं अच्छा काम कर रहे हैं.
    दिल्ली के पत्रकार और उनके मालिक तो भ्रष्टों के हाथ बिक गए हैं. बल्कि कहा जाय कि
    वे खुद भी भ्रष्ट हैं, इसीलिए अन्ना के साथियों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है.
    आपलोग खुलकर सामने आकर इसका पर्दाफाश करें.

    कविता बड़ी अच्छी लिखी तो. इस रेगिस्तानी गरमी में नखलिस्तान का सुकून मिला. मन प्रसन्न हुआ.

    और भी लिखें. और भी प्रकाशित करें. अपने जैसे फिल्मवालों और विद्वानों का एक समूह बना लिया होगा. तो उसके बारे में मुझे भी बताएं.

    आपलोग एक प्रेस सम्मलेन करके इन दिनों चल रही सरकारी साजिश का पर्दाफाश करें.

  12. anil khanna says:

    in india,77% of its people earn 2 dollars a day.25%of all urban housing is slum with mumbai representing 50% slum.41%of indian lives in one room flat.80%of indians do not have bank account.report of starvation and malnutrition come in from across the country.do read:http://blogs.hindustantimes.com/hindi-heartland/2010/08/24/wheat-let-it-go-to-the-dogs/#respond
    your poetry describe dilapidated condition of india;a proverbial poetry escape.

  13. Rudra says:

    As I posted earlier , Poignant poems are pointless . Here is a poem to inspire everyone :

    हम करें राष्ट्र आराधन
    हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

    तन से, मन से, धन से
    तन मन धन जीवन से
    हम करें राष्ट्र आराधन
    हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

    अंतर से, मुख से, कृति से
    निश्चल हो निर्मल मति से
    श्रद्धा से मस्तक नत से
    हम करें राष्ट्र अभिवादन
    हम करें राष्ट्र अभिवादन

    हम करें राष्ट्र आराधन
    हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

    अपने हँसते शैशव से
    अपने खिलते यौवन से
    प्रौढ़ता पूर्ण जीवन से
    हम करें राष्ट्र का अर्चन
    हम करें राष्ट्र का अर्चन

    हम करें राष्ट्र आराधन
    हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

    अपने अतीत को पढ़कर
    अपना इतिहास उलट कर
    अपना भवितव्य समझ कर
    हम करें राष्ट्र का चिंतन
    हम करें राष्ट्र का चिंतन

    हम करें राष्ट्र आराधन
    हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

    है याद हमें युग युग की
    जलती अनेक घटनायें,
    जो माँ की सेवा पथ पर
    आई बन कर विपदायें,
    हमने अभिषेक किया था
    जननी का अरि षोणित से,
    हमने श्रिंगार किया था
    माता का अरि-मुंडों से,
    हमने ही उसे दिया था
    सांस्कृतिक उच्च सिंहासन,
    माँ जिस पर बैठी सुख से
    करती थी जग का शासन,
    अब काल चक्र की गति से
    वह टूट गया सिंहासन,
    अपना तन मन धन देकर
    हम करें राष्ट्र आराधन
    हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

    तन से, मन से, धन से
    तन मन धन जीवन से
    हम करें राष्ट्र आराधन
    हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

    The spirit of this poem , is the only way that India can solve its problems.

  14. Surabhi says:

    शेखर जी ,

    एक”निडर कवि” की अच्छी अभिव्यक्ति पढने को मिली, सोचा मैं भी कुछ कहूंl

    एक रोटी और जीने का तो हक है हमारा।
    सुनुँ क्या “शेखर”, मैं गर्जन तुम्हारा ।
    स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं ।
    कहूँ क्या कौन हूँ मैं, क्या ये आग मेरी,
    बँधी है लेखनी से, क्या लाचार हूँ मैं?
    दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा की,
    दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं।
    यह सुनामी जो लायें हैं,हमारे “अन्ना”l
    इतने दिनों तक आपने और हमने,
    हर दोराहे और चौराहे पर खड़े हो कर,
    अपने अस्तित्व को बनाए रखा।
    हम जीना चाहते हैं, भ्रष्टाचार से मुक्त भारत में।
    लड़खड़ा कर गिरने से पहले,हम कामयाब होना चाहते हैं l
    अब तो तय कर लिया है,
    एक रोटी और जीने का हक तो हम पाना चाहते हैं l

    प्रणाम!!
    सुरभि

  15. Surabhi says:

    शेखर जी
    एक निडर कवि की अभिव्यक्ति को पढ़ा,समझा और पसंद कियाlसोचा कुछ कहूँl

    एक रोटी और जीने का तो हक है हमारा।
    सुनुँ क्या “शेखर”, मैं गर्जन तुम्हारा ।
    स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं ।
    कहूँ क्या कौन हूँ मैं, क्या ये आग मेरी,
    बँधी है लेखनी से, क्या लाचार हूँ मैं?
    दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा की,
    दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं।
    यह सुनामी जो लायें हैं,हमारे अन्नाl
    इतने दिनों तक तुमने और हमने,
    हर दोराहे और चौराहे पर खड़े हो कर,
    अपने अस्तित्व को बनाए रखा है।
    हम जीना चाहते हैं , भ्रष्टाचार से मुक्त भारत में।
    लड़खड़ा कर गिरने से पहले,हम कामयाब होना चाहते हैं l
    अब तो तय कर लिया है,
    एक रोटी और जीने का हक तो हम पाना चाहते हैंl

    Regards
    सुरभि

  16. Surabhi says:

    Thanks 🙂

Leave a Reply